अग्निपाखी

जीवन के संघर्षों के अग्निकुंड में जलते हुए अपनी ही राख से पुनर्जीवित होने का अनवरत सिलसिला....

हर आती जाती सांस
उकेरती है / नए स्वप्न लहरियों का
अद्भुत तिलिस्मी संसार
हमारी उदास / अनमनी मनभित्तियों पर
भले ही न हो फ़ुर्सत
या बची हो सामर्थ्य
संसार की चकाचौंध से
धुंधलाई / निष्प्रभ आंखों में
उन्हें देख पाने की
....

जब / तब / बारंबार
टूटे / अधजले स्वप्नों का मलबा
अक्सर / सेंध मार
किसी चोर दरवाजे से
प्रवेश कर
धराशायी कर देता है
सभी वहमों के
सूक्ष्म महीन तानों बानों को
दबे ढके रहते है जिनमें
अक्सर / हम सब के संसार
....

फ़िर भी / कभी कभार
कौंध जाती है उनमें भी
रह रह कर
भूले बिसरे / आधे अधूरे सपनों के
बुझती चिंगारियों का क्षणिक उजास
...

जो ठहर जाता है / कुछ पल के लिए
उमड़ते / फ़ेनिल काल प्रवाह में
किसी झिलमिलाते प्रकाशस्तंभ सा
टेढ़े मेढ़े रास्तों के मकड़ जाल से
खोई हुई / रूठ कर नींद में डूबी हुई
मंजिलों का / पता / दिशा देता
फ़िर करता आह्वान / किसी नए सफ़र का
........
........



कैसी भी कर्कश धुनें हो गूंजती हमारी बेसुरी जिंदगियों में
संमदर तो उन में से भी एक खुशनुमा गीत बना लेता है
........

भले न हो सधी सधाई जिंदगियों में उसकी कोई खास जगह
संमदर जानता है सब कुछ फ़िर भी दिलों में किसी ख्वाब सा धड़कता है
........

रास्ता बदल लें लाख कतराकर लोग उसे भूल जाने की कोशिश में
संमदर मगर फ़िर भी हर मोड़ पर ठहर कर उनका इंतजार करता है
........

जवाबों की भूलभुलैया में न जाने क्यों अक्सर भटकते रहते है
लोग नहीं जानते कि सवालों के सही जवाब समन्दर के पास ही होते हैं
........
........

कभी कभी न जाने कैसे
क्या से क्या हो जाता है
जब मुश्किल हो जाता है
सही और गलत में फ़र्क करना
और कोई नामालूम शक
उठाता है सिर जब तब
डराता है रात बिरात
सुनसान सन्नाटे में
बजने लगता है गजर सा
घनघनाटा, टनटनाता
उकेर जाता है जाने
कैसे कैसे दुस्वप्न मनभित्तियों पर
शांत झील में डाल देता है खलल
आसमान धूसर हो जाता है/ तब
सूरज धुंधला जाता है
बुझने लगती हैं
तारों की भी रोशनियां
हरियाली भी देने लगती है ताप
सब कुछ जंगल हो जाता है!!
........
........



पी जाए हमारे भी हिस्से का जहर
नीलकंठ बन जाए कोई दूसरा
काश आ जाए कोई दूसरा
........

ऊबे बैठे है तमाशाई सब
चमत्कार दिखला दे कोई दूसरा
काश आ जाए कोई दूसरा
........

भेड़ें हैं चल पड़ेंगे फ़ौरन
बस रहनुमा बन जाए कोई दूसरा
काश आ जाए कोई दूसरा
........

पूजेंगे बाद में बुत बनाकर
शहीद अभी हो जाए कोई दूसरा
काश आ जाए कोई दूसरा
........

अंधेरा है पर हिम्म्त नहीं है हममें
आग चुरा कर ला दे कोई दूसरा
काश आ जाए कोई दूसरा
........
........


संभावना बची रहे
आने वाले समयों में
जिंदगियों में हमारे
हंसने की/ गाने की
रोने की/ शोकित होने की
बचपने की/ मूर्खताओं की
पागलपन की/ गल्तियों की
........

संभावना बची रहे
महज कंकड़ पत्थर
या तुच्छ कीट कीटाणु
निष्प्राण पाषाण/ या
बर्बर पशु बनते जाने के,
मनुष्य बने रहने की
........

संभावना बची रहे
इस आपाधापी/ कोलाहलमय
जीवनों में
आकाश की ओर ताकने की
और लहरों को गिनने की
हमारी उबड़खाबड़ जिंदगियों में
स्नेह, संवेदना एव करूणा की
कोमल कलियों के खिलने की
........

संभावना बची रहे
जीवनों के
खिलने की/ पनपने की
सपने देखने की
नई सृष्टि रचने/ बनने की
मनों के/ अंधेरे
सर्द/ सूने गलियारों में
सूरज के किरणों के
अल्हड़ ताका झांकी की
........

संभावना बची रहे
तमाम दुश्मनी और दूरियों को भूलकर
आपस में/ एक दूसरे के लिए
महज मूक दर्शक/ तमाशबीन बने रहने के
दर्पण और दीपक बनने की
हमसफ़र और रहनुमा बनने की
........

संभावना बची रहे
हमारी सुविधाभोगी, मौका परस्त
मतलबी, हिसाबी किताबी जिंदगियों में
कभी कभार, यूं ही
बेमकसद/ बेवजह जीने की
दूसरों को अपने किसी स्वार्थ सिद्धि हेतु
महज साधन या सीढ़ी सा
इस्तेमाल करने की बजाए
उन्हें भी खुद सा समझने की
........

संभावना बची रहे
कटु कर्णभेदी शोरगुल के
आदी/ अभ्यस्त हमारे मनों में
कोमल/ निशब्द/ शब्दहीन बातों के
पारदर्शी रूप छटा को
समझने/ पहचानने की
जुबान की दहलीज पर ठिठके/ सहमे
शब्दमाला से कोई सुंदर सा गीत पिरोने की
........

संभावना बची रहे
अर्धसत्यों/ षडयंत्रो
छल प्रपंचो के
काई पटे कीच में
डूबते/ उतराते
महज सांस भर ले पाने की
........

भागमभाग के जिन्न के
पंजो मे दबोची हुई जिंदगियों के
सांस थमने से पहले
मिले फ़ुर्सत पल भर को
भरपूर सांस ले
अपना अपना जीवन
जी पाने की
........

संभावना बची रहे
मिटने/ खत्म होने हम में
छोटे छोटे स्वार्थों के लिए
गिरते हुओं को रौंदकर
सबसे आगे निकलने की प्रवृत्ति का
दूसरे की कीमत पर
खुद को बेहतर सिद्ध करने का
........

संभावना बची रहे
आने वाले समयो में
अंधेरे अंतहीन ब्लैकहोल (श्याम विवर) में
गर्क होती जिंदगियों की विरासतों का
नक्षत्र/ नीहारिकाएं और
अनगिन रोशनी की लकीरें बन
अंतरिक्ष में जगमगाने का !!
........
........

कांचघर की दीवारों से घिरी
सुरक्षित/ आश्वस्त
साम्राज्ञी सी
निश्चिंत घूमती है दिन रात
अपनी छोटी सी दुनिया के
निश्चित से दायरे में
किसी कठपुतली सी
मौन/ निजी एकालापों में गुम
........

नहीं जान पाती
कि गुजर रही है करीब से
जिंदगी
किसी अनजानी सी धुन पर
थिरकती
जिसकी मंद होती हुई गूंज
कभी कर देती है बेचैन
कभी उदास !
........

कब में
निगल जाती है चुपचाप
कवच बन
कांचघर की दीवारें
हर पुल/ हर रास्ता
जिंदगी जिनके सहारे
सौंप जाती है
सबको अपने सपने
........

नहीं जान पाती
कहीं पहुंचने के भ्रम में
भटकती है बेखबर
अपनी छोटी सी दुनिया के
निश्चित से दायरे में
किसी कठपुतली सी !!
........
........



मन
किसी बिगड़ैल घोड़े सा
बारंबार निषिद्ध मार्गों पर
भाग जाना चाहता है सरपट
बदहवास लगाम थामे
सुनती हूं मैं
दूर कहीं ---
सूखे पत्ते का झड़ना
जमी हुई बर्फ़ का चटकना
और कर्कश कौओं का चिल्लाना !!



यूं ही बेवजह
बजता है / अब भी
पतझड़ राग
मन की सूनी दीवारों पर
........
यूं ही बेवजह
अनमनी सी टहलती है
सहमी हुई चाहें
नींद और जाग के दरम्यान
........
यूं ही बेवजह
उंगलियां तराश देती है
फ़िर से नया कोई बुत
भले ही पत्थर बने रहे वो
बरसों पूजने के बाद
........
यूं ही बेवजह
लौटा लेने को/ जी
चाहता है
बीते पलों का
दिलकश जादू ....!!

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