अग्निपाखी

जीवन के संघर्षों के अग्निकुंड में जलते हुए अपनी ही राख से पुनर्जीवित होने का अनवरत सिलसिला....

अपने अपने कारावासों के
अनायास ही कभी बन आए/ बंदी से हम
कभी अन्जाने तो कभी जानबूझकर
कैद की दीवारों में से
किसी अन्देखे से छेद से झांकती
धूप के नन्हें से टुकड़े का
ताजी हवा के हल्के से उस झौंके का
मात्र एक हिस्सा बनने की चाह लिए
पल भर के लिए ही/ शायद
निकले हैं कभी झिझकते/ ठिठकते
चौंकते, ठहरते से कभी
अपने कैद की परिधि से बाहर
पर दूसरे ही पल/ विवश सा
खींच लिया है कदमों को वापस
अपने बंद अंधेरे कमरों में
बाहर की तेज चकाचौंध भरी/ धूप से
घबराकर
जलन और तपन का
एक तीखा सा अहसास लिए
अन्जानी हवा में घुटन महसूसते
कैद की उन्हीं अंधेरी दीवारों के बीच
उसी रची बसी/ जानी पहचानी घुटन में
जो नितांत अपने से ही तो हैं....!

वेटिग फ़ार गोदो बनाम इंतजार का सफ़रनामा

हम किसलिए जीते हैं.... किसलिए.... हर वक्त किसका इंतजार रहता है नहीं मालूम.... और समूची जिंदगी इसी इंतजार में निकल जाती है. कभी लगता है जिंदगी कुछ और नहीं सिर्फ़ इसी इंतजार का दूसरा नाम है.... शायद " वेटिग फ़ार गोदो " के पात्रों की तरह हम सब भी न जाने सारी जिंदगी किसका इंतजार करते रहते है जो आने का वादा करके भी कभी नहीं आता.... और पूरी की पूरी जिदगी इसी बेतुके इंतजार में बीत जाती है.... पर इस इंतजार से मुक्ति भी तो नहीं है.... नहीं तो जीना कितना आसान हो जाता....

जो सामने है उसी को सच मान लेना.... जी लेना सोचे समझे विचारे बगैर.... सचमुच कई बार लोगों से ईषर्या होती है जिनकी भरी पूरी जिंदगियों में ऐसी बेतुकी मूर्खताओं के लिए कोई जगह नहीं होती.... जहां कोई तलाश, कोई भटकन/ यात्रा का नामोनिशान तक नहीं.... जिन जिंदगियों की नीच त्रासदी यही है कि इनमें कोई त्रासदी नहीं घटती.... न ही घटने की गुंजाईश हो शायद.... कौन जाने.... सुविधाओं/परेशानियों के परे कोई तलाश, कोई भटकन नहीं.... ?!

अतीत में एक छलांग

कभी कभी लगता है मानो कहीं दुबारा लौटना भी अर्थहीन/ असंगत/ बेतुका नहीं होता. शायद उस वक्त हम एक नई अंतर्दृष्टि नई समझ के साथ अतीत को "एप्रोच" करते है....और तब अतीत शायद हमें उतना अधिक क्रूर, कटु, बेतुका और अनसमझा नहीं लगता .... शायद अतीत की ओर लौटना इतना बेमानी और फ़िजूल भी नहीं होता....शायद उस वक्त तक समय या नियति हमें और हमारी अंतर्दृष्टि को कुछ और अधिक सुस्पष्ट एवं पैना कर देती है. उन्हें चीजों/ बातों के आर पार देखने लायक बना देती है ताकि हम उन सब चीजों/ बातों के महत्त्व को अच्छी तरह से जान/ समझ लें जो किसी वक्त हमें अबूझ और समझ के परे लगती थी और उन्हें सद् भाव/ करूणा के साथ समझकर अपनाएं, अपने जीवनों में उनका स्थान सुनिश्चित कर उन्हें स्वीकारें जिनसे हम निरंतर लड़ते रहे हैं....और उनका विरोध करते रहे हैं....

हां, अगर हम यह सब कर पाने में स्वयं को अक्षम या असमर्थ पाते हैं तब शायद हमने स्वयं को प्रकृति के खिलाफ़ जाकर, जीवन प्रवाह में बहने से इंकार करके खुद को इतना अधिक थका दिया होता है कि कुछ भी करने/ सोचने / समझने की शक्ति और सामर्थ्य चुक जाती है और किसी बेजान कपड़े की गुड़िया की तरह सिर्फ़ स्थितियों/ परिस्थितियों का शिकार ही बनते रहते हैं.... "विक्टिमाइज्ड" होते रहते है.... कहीं पर यह हमारा चेतन चुनाव होता है तो किसी स्तर पर अचेतन चुनाव....!

जब एक बार हम "स्व" से अपना ध्यान हटाकर अपनी दृष्टि सृष्टि/ ब्रह्मांड पर केंद्रित करते है तब हम अपने आपको बिलकुल क्षुद्र नगण्य और हीन पाते हैं और सृष्टि/ ब्रह्मांड की विशालता हमें आतंकित कर देती है क्योंकि हम स्वयं को उससे अलगा कर देख रहे होते हैं. जब हम स्वयं को उनके बीच रखकर और अपने अनूठेपन यानी " यूनीकनैस" को ध्यान में रखकर देखें तो शायद हमें यह समझ लेने मे आसानी रहे या कि हमें यह समझ में आए कि समूची सृष्टि/ ब्रह्मांड में हमारे स्वयं का क्या स्थान है और हमारी क्या भूमिका हो सकती है.

इन सबके साथ यह भी जान लेने में ही भलाई है कि हम चीजों/ परिस्थतियों को समझने / सुलझाने मे रूचि रखते हैं या उन्हें उलझाकर सिर्फ़ उन्हें तोड़ फोड़कर नष्ट भ्रष्ट करने में. इन्हीं प्रश्नों के उत्तर पर समस्त मानवजाति की उत्तरजीविता यानी " सर्वाइवल " का रहस्य टिका हुआ है. क्योंकि अंतत: हमारे समस्त कार्यकलाप और कार्य व्यवहार हमारे साथ साथ हमारे आस पास के वातावरण को भी प्रभावित करते हैं....

किसी भी चीज को तोड़ना वहां पर तो एक अंतिम विकल्प हो सकता है जहां जोड़ने/ सुलझाने की कोई संभावना ही नहीं बची है पर महज तोड़ने/ नष्ट करने के लिए किसी चीज को तोड़ना/ नष्ट करना केवल इस वजह से कि वो आपके मन मुताबिक नहीं है शायद उचित नहीं है.

सृष्टि को बेहतर बनाने अथवा बिगाड़ने में हमारी कितनी बड़ी या नगण्य भूमिका हो सकती है और इस सबके क्या परिणाम निकल सकते है बगैर यह जाने हम बेमतलब बेतुकी अर्थहीन लड़ाईयों में खुद को इतना अधिक थका डालते है कि अपनी समस्त संभावनाओं पर झाड़ू फेर देते हैं और हर बात का नियति या समय पर दोषारोपण करके खुद साफ़ बच निकलते हैं.

रिश्तों के चक्रव्यूह ४

हमारा सारा ध्यान सिर्फ दूसरे की ओर लगा रहता है....उस के दोष कमियां और खामियां निकालने और उसे तुच्छ हीन और नाकारा साबित करने की सदा कोशिशें चलती रहती है क्योंकि तभी स्वयं को सही संपूर्ण और परफ़ेक्ट ठहराया जा सकता है. हमारी दृष्टि या ध्यान कभी अपने अंदर तक नहीं जाती या मुड़ती.... दूसरे के आचार व्यवहार क्रियाकलाप से हम दुखी हैरान परेशान और कभी कभी खुश भी होते रहते हैं. चाहे हमारे स्वयं की कितनी ही हेय दयनीय दशा क्यों न हो हम दूसरे को तकलीफ़ में कष्ट में पीड़ा मे देख कर खुश होते हैं....दूसरों का सुख या खुशी हमें परेशान पागल कर देता है.... किसी के साथ सहभागिता रखने से हम बचते हैं क्योकि उस के सुख दुख में शामिल होना इन्वाल्व होना है और इन्वाल्वमेंट के अपने खतरे हैं जिनसे अक्सर हम नहीं जूझना चाहते.... इन्वाल्वमेंट या लगाव अपने साथ कई दायित्व भी लाता है जिन्हें हम अपने ऊपर ओढ़ने से बचते और कतराते हैं क्योंकि तब हम अपनें चारों ओर घटने वाली बातों के प्रति अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते.

रिश्तों के चक्रव्यूह ३

कभी कभी लगता है कि संबंधों में सब एक दूसरे को अपने मुताबिक महज " फ़िट " करना चाहते है " फ़िट " होना नहीं चाहते.... यही इन संबंधों की त्रासदी है. संबंधों का अर्थ एक दूसरे को करीब लाकर उन के बीच फ़ैली अंतहीन दूरियों को पाटकर उन्हें जोड़ना नहीं वरन एक दूसरे को तोड़ना भर रह गया है. जब कोई किसी दूसरे के हिस्से का सांस नहीं ले सकता तो किसी दूसरे की नियति तक का मालिक या रचियता होने का दावा कैसे कर सकता है?

संबंध साथ भर है एक अहसास मात्र.... अपनी अपनी कमियों/ खूबियों के बावजूद एक दूसरे से जुड़ना, जुड़कर साथ चलना/ रहना न कि कमियों / खूबियों को आरोपों की तरह एक दूसरे पर थोपना और लगातार थोपते रहना.... पर संबंधों का जब " इस्टिट्य़ूस्नालाज़ेशन " हो जाता है तो संबंध बचे नहीं रह सकते....बचता है सिर्फ़ दिखावा.... "शिमेरा" या एक " फ़ार्श "!

क्या दूसरा मात्र तुम्हारा " रिप्लिका " है कोई प्रतिमूर्ति या गीली मिट्टी का लौंधा मात्र जिसे तुम चाहे जो आकार / रंग / रूप दे दो. दूसरे का क्या कोई अपना अलग पृथक स्वतंत्र अस्तित्व नहीं....

संबंध दूसरे को भावनात्मक शारीरिक मानसिक और आत्मिक रूप से शोषित करने का मात्र एक जरिया है. यह एक दूसरे के साथ " इंट्रएक्ट " कर एक दूसरे की बेहतरी या आत्मिक भरपूरी समृद्धि के लिए नहीं वरन एक दूसरे को दमित या शोषित करने में प्रयुक्त होता है. दूसरा हमेशा बाहरी या अजनबी बना रहता है....परिधि के परे.... वो कभी आपके अस्तित्व का केंद्र नहीं बन पाता.... कभी आपका हिस्सा नहीं बन पाता.... दोनों मिलकर एक एकीकृत इकाई नहीं बन पाते....पर भला क्या ऐसा वाकई संभव नहीं है कौन जाने?!

रिश्तों के चक्रव्यूह २

कभी कभी लगता है कि हम एक दूसरे से नहीं वरन एक दूसरे के "आईडिया" से ज्यादा प्यार करते है जिन्हें हम सब में मौजूद कल्पना और सृजनशीलता साथ मिलकर अनूठे रंगो से सजा हमारे सम्मुख परोस देती है किसी स्वादिष्ट छप्पन भोग सा, जिसका स्वाद यथार्थ से साक्षात्कार के बावजूद मन के किसी कोने में शेष रहता है किसी "नास्टेल्जिया" की तरह. जहां किसी तरह के "कन्फ़लिक्ट" की गुंजाईश ही नहीं जहां अपने उन "आईडियाज" को अपने मन मुताबिक " चेंज" "अरेंज" या "री अरेंज" करने की बेहिच् आजादी है.

पर जब यथार्थ में हम एक दूसरे के करीब होते है तो दूसरे की हर कमजोरी को "मैग्नीफ़ाई" करके देखते हैं उसमें मौजूद सभी गुणों को अन्देखा करने की एक अवचेतन प्रयास के चलते जो हममें मौजूद अहं भाव का जरखरीद गुलाम मात्र है. तब हम एक दूसरे को तोड़ मरोड़कर अपने मुताबिक बना लेना चाहते है. उसे अपने जैसा बना लेने की इच्छा के वशीभूत होकर, ताकि दूसरा हमारा बन सके, हमारे साथ जी सके.... रिश्तों में भी स्वामित्व की भावना पीछा नहीं छोड़ती चाहे नतीजा हो " अगली सीन्स " या "कन्फ़्रन्टेशन".... एक बेवजह नरक!

केवल इस एक वजह के कारण कि आप दूसरे को कितना (?!) चाहते हैं, क्या हक है आपको कि आप दूसरे से "इम्पासिबल" की उम्मीद रखें अपनी जिंदगी सुविधाजनक सुख शांतिमय बनाने के लिए किसी दूसरी जिंदगी को अपने मन मुताबिक ढालने की कोशिश में उसे तोड़ मरोड़कर एक अपाहिज बनाकर छोड़ दे.... आखिर क्यो??

रिश्तों के चक्रव्यूह १

कभी कभी तो लगता है मानो सब लोग यहां अपने अपने मतलब या जरूरत के हिसाब से समझते हैं एक दूसरे को.... न कम न ज्यादा.... किसी को ज्यादा जानकर समझ कर क्या लेना. किसी को ज्यादा जान लेने से क्या फ़ायदा.... इन सब बातों में कोई क्यों भला अपना समय बरबाद करे? पर क्या इतना भर किसी को जान लेना या समझ लेना पर्याप्त है....? क्या दूसरा हमेशा " दूसरा " ही बना रहेगा....? फ़िर हर वक्त क्यों हमें किसी की तलाश रहती है जो हमें समझ ले.... हमें पूरी तरह से समझ ले. मानो इस समझने, न समझने पर ही हमारी पूरी जिंदगी का दारोमदार टिका हुआ है. अगर कोई हमें नहीं समझता तो उसकी "ज्यादती" है. भला कहीं यूं अनसमझा अन्जाना होकर भी जिया जा सकता है क्या....? मालूम है कि हर बार यह तलाश भटकाती मात्र है.... यह तलाश हमें कहीं पहुंचने नहीं देती.... पर ज्यादातर लोग इसी तलाश का शिकार हो इस जिंदगी के रेगिस्तान में भूखे प्यासे मर खप जाते हैं.... क्या यही जिंदगी है.... क्या जिंदगी का यही मतलब है....?

क्यों कभी लगता है दूसरा हमेशा " दूसरा " ही बना रहेगा.... क्या अकेले अकेले जीना ही हम सबकी नियति है.... और " साथ " महज एक स्वप्न.... क्षणिक.... एक पल का, कुछ पल का.... पर पूरे जीवन के काल प्रवाह में सुख के उस पल की क्या बिसात.... क्या उस एक पल के सहारे पूरी जिंदगी काटी जा सकती है.... उस एक पल को कालातीत मानना मानो समय की गति को रोक देने की बचकाना कोशिश से कुछ ज्यादा तो होगी नहीं.... समय और काल के परे भी क्या जिंदगी संभव नहीं....

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